कयामत के दिन
Friday, September 26, 2008
रोना सुन लोगों का
कविता भूल रहा हूँ।
नेता के वादों संग
हवा में झूल रहा हूँ।
बिना सिर- पैर की कविता
लिखनें को जी करता है,
क्यू बेकसूर नित मरते,
नेता नही मरता है ?
अरे नासमझ आतंकी !!
हम- तुम को सतानें वाले,
कही ओर हैं बैठे।
बेकसूरों संग भैईए
क्यूँ तुम हो ऎठें।
फोडना है तो
उन का सिर
जा कर के फोड़ो।
जिन की कृपा से बना गधा,
जो कभी था घोड़ो ।
रब का नाम ले जिसने
तुझ को भरमाया।
इस राह पर चल कर तुझे
मिलेगा उस का साया।
क्यूँ नही तू इस राह पर चल ,
उस को पा लेता।
इस राह पर चलनें से पहले
पूछ तो लेता।
मार-मार कर
इक दिन तू भी मर जाएगा।
कयामत के दिन बैठ
बहुत फिर पछताएगा।

September 26, 2008 10:17 PM
बहुत ही सुन्दर कविता कही हे आप ने, काश उन लोगो की आंखे खुले जो यह सब करवाते हे, लेकिन किस के लिये???
धन्यवाद
September 27, 2008 11:58 AM
mere blog par aane ke liye dhanyewaad agar aapki tarah or logo ko bhi meri baat samaj aa jaaye to mera hindustan videsh mein na baske har hindustani ke dil mein basega saccha bharat
September 27, 2008 4:33 PM
saral shabdon mein sachi baat. Kafi acha laga aapka blog.
September 29, 2008 2:40 PM
बाली साहिब ,बहुत सुंदर रचना =सच में एक बार पढ़ कर फ़िर दुबारा पढी
September 30, 2008 4:40 PM
वाह बाली साहब ! मान गए
October 1, 2008 12:27 PM
बिना सिर- पैर की कविता
लिखनें को जी करता है,
क्यू बेकसूर नित मरते,
नेता नही मरता है ?
सुंदर और सार्थक मेरे ब्लॉग पर पधारने का धन्यबाद . नियमित आगमन मेरे सबल और उत्साह को बढाएगा
October 2, 2008 10:22 AM
फोडना है तो
उन का सिर
जा कर के फोड़ो।
जिन की कृपा से बना गधा,
जो कभी था घोड़ो ।
bahot hi sacchi yatharth se parichay karaya aapne ...satya hai.... badhai.
regards
October 2, 2008 9:04 PM
इस राह पर चलनें से पहले
पूछ तो लेता।
मार-मार कर
इक दिन तू भी मर जाएगा।
कयामत के दिन बैठ
बहुत फिर पछताएगा।
sahi kathan
October 2, 2008 10:36 PM
ATI
SUNDAR BEHATREEN SIR JEE
October 3, 2008 1:15 PM
bahut hi badhiyaa likha hai