आँसू
Saturday, January 31, 2009

उन की आँख के
आंसू देख कर
हम ने पूछा-
किस कि याद आई है?
ये पीड़ा किस से पाई है?
वह बोली-
आज कल
सब्जी महँगी हो गई है।
इसी लिए
मिर्ची से रोटी खाई है।

उन की आँख के
आंसू देख कर
हम ने पूछा-
किस कि याद आई है?
ये पीड़ा किस से पाई है?
वह बोली-
आज कल
सब्जी महँगी हो गई है।
इसी लिए
मिर्ची से रोटी खाई है।
Posted in कविता, हास्य कविता by परमजीत बाली
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January 31, 2009 10:55 PM
वाह क्या बात है...:) हाय हाय यह मजबुरी...
February 1, 2009 3:09 PM
सी सी.... हाय हाय ।
February 2, 2009 9:47 PM
aapne sahi kahaa!! prakriti ka bahut hi sundar varnan hai !!! dhanyavad...
Mahesh
February 3, 2009 10:37 PM
aapne mehngaayi pur bada hi tagda prahaar kar dala...mahngaayi ke bhi aansu nikal aaye.. :)
kabhi fursat mein mere blog par tashreef laayein aur mujhe kuchh seekhne ka mauka dein
mere blog ka link hai ---
http://merastitva.blogspot.com
February 4, 2009 12:32 PM
सुन्दर क्षणिका।
देखन में छोटी लगी, घाव किया गम्भीर।
February 4, 2009 12:45 PM
हाहाहाहा, सटीक
February 4, 2009 1:44 PM
परमजीत जी
थोड़े से शब्दों में इतनी गहरी बात...........साधुवाद
ये तमाचा है आज के हालत पर
February 7, 2009 5:27 PM
दुख हो या सुख की शहनाई बजतीं हो,
आँसू कथा-व्यथा,सबकुछ कह जाते हैं।
मँहगाई के हों, या मिर्च-मसालों के,
आँसू अँखियों से बरबस बह जाते हैं।।
February 7, 2009 9:55 PM
बहुत खूब.. प्याज का भी यही काम है!
February 8, 2009 11:18 PM
Ye Mirchi ka falsfa axxha lga...!