Friday, March 14, 2008

जरा सोचिए

इस में छिपे संदेश के बारे में आप क्या कहते हैं-

2 टिप्पणियाँ:

Dr. Chandra Kumar Jain said...

कोई नहीं पराया जग में
धरती रैन बसेरा है .
इसकी सीमा पश्चिम में
तो मन का पूरब डेरा है .
गलियाँ गाँव गूंजाता चल
सबको गले लगाता चल
हर दरवाज़ा प्रभु दुआरा
सबको शीश नवाता चल.

नीरज जी की हैं पंक्तियाँ.

Suresh Chandra Gupta said...

हाथ फिसल गया, बाकई. बहुत सही.

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