दशहरे की बधाई  

Thursday, October 9, 2008

आज सुबह नीदं देर से खुली
लेकिन उठते ही हम ने
पत्नी को दी-
"दशहरे की बधाई।"
यह सुन पत्नी चिल्लाई-
ओ कुम्भंकरण के भाई!
आज छुट्टी है तो
क्या पड़े-पड़े खाट तोड़ोगे।
उठकर काम मे हाथ बटाओं,
शाम होने से पहले ही तुम
दोस्तों संग दशहरा देखने दोड़ोगे।

हमने कहा-
हमें रावण का भाई मत कहो,
हम तो रामजी के पद चिन्हों पर चलते हैं।
पत्नी बोली-
रहने दो।
आज सभी पुरूष
राम के नाम पर
हम अबलाओं को छलते हैं।
हमने पूछा-
हमने कब छला जरा बतला दो।
वह बोली -
सदियों से हमे अर्धागनी कहते हो,
अब बराबरी का हक भी दिलवा दो।
हमने तेश मे आकर कहा-
जाओ !आज से हमने तुम्हें ,
बराबरी का हक दिया।
अब क्या कहती हो बता दो।
वह बोली-
ठीक है,
अब जरा चुन्नु-मुन्नु को नहला दो।
अब अपनी बात पर कैसे टिके रहे?
भाईयों जरा बता दो।
हमारी इस अधुरी कविता को
कोई पूरा करवा दो।

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5 टिप्पणियाँ: to “ दशहरे की बधाई

  • दीपक भारतदीप
    October 9, 2008 9:29 AM  

    दशहरे के पावन पर्व, नये ब्लाग के सृजन और सुंदर व्यंग्य कविता पर मेरी तरफ से बधाई स्वीकार करें।
    दीपक भारतदीप

  • SHUAIB
    October 9, 2008 11:31 AM  

    आपको दशहरे की बधाई

  • राज भाटिय़ा
    October 9, 2008 2:38 PM  

    अरे भाई हम खुद नही नहाते ओर आप चुन्नु मुन्नु को भी नहलाने के लिये कह रही है, राम राम , बेसे नहाने से क्या लाभ गंदे फ़िर से हो जायेगे, चलो फ़िर से सोये......
    आप सभी को दशहरे की हार्दिक शुभकामनाएं

  • G M Rajesh
    October 10, 2008 12:18 PM  

    aapki adhuri chodi ko
    poora karne ki jurrat hum kare
    fir chaay se aur aapse kaam le lene wali bhabhiji ko bhi kho de
    na baba na

  • SHUAIB
    October 11, 2008 12:46 PM  

    आपको दशहरे की बहुत बहुत बधाई

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